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प्रत्येक वर्ष ४ देखि ५ खर्बको दरले |
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बजेटको चाहिँ आकार बढाउने हिम्मत आँट र स्रोतको सुनिश्चितताको खोजी |
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हामी अहिलेको चाहिँ एक्काइसौँ शताब्दीको यो |
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युगमा नेपाल अगाडि बढ्न सक्थे। त्यसकारणले लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाको यो कविता |
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हामी सबैको निम्ति पनि मनोयोग्य छ र हामी पहल गरेर |
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सक्नुपर्छ त्यसमा अन्य अर्थ अति कम विकसित राष्ट्र समूहबाट |
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विकासशील राष्ट्रमा हामी २०२६ सन्देखि |
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शब्दले मातृभार भएन लगानी चाहियो स्रोत चाहियो साधन चाहियो |
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अन्तर्राष्ट्रिय सोचाई हामीले लगानीकर्तालाई जुटाएर अपिल गर्न सक्नुपर्यो |
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भएको छ त कतार जस्तो देशमा यति सानो देश छ संसारभरिका लगानीकर्ताहरू केन्द्रित भएका |